मैं और तुम कभी आशना थे
पिछली रात तेरी यादों की झड़ी थी मन भीग रहा था जैसे-जैसे रात बढ़ती थी चाँद से और जागा नहीं जा रहा था… बेचारी नींद!!! आँखों से यूँ ओझल थी जैसे कि कुछ खो गया हो उसका जब आँखों में नींद ही नहीं थी तो क्या करता…? तुम में मुझमें जो कुछ था उसे तलाशता रहा सारी रात सारी कहानी उधेड़कर फिर से बुनी मैंने तुमने कहाँ से शुरु किया था कुछ ठीक से याद नहीं आ रहा था नोचता रहा सारी रात अपने ज़ख़्मों को ज़ख़्म ही कहना ठीक होगा दर्द-सा हो रहा था साँस बदन में थम-थम के आ रही थी कभी आँसू कभी ख़लिश तुमने ग़लत किया – या मुझसे ग़लत हुआ कोई तो रिश्ता था जिसमें साँस आने लगी थी मगर किसी की नज़र लग गयी शायद… साँस तो आ चुकी थी मगर रिश्ता वो अभी नाज़ुक़ था अगर मैं कुछ कहता तो तुम कुछ न …